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1

Pooja Valecha,

Abstract: This study examines the psychological effects of social media use on adolescents. It explores the potential benefits, such as improved communication and social connection, as well as the potential negative consequences, including cyberbullying, addiction, and negative body image. The paper aims to provide a comprehensive understanding of the complex relationship between social media and adolescent mental health and offer recommendations for responsible social media use.


1-8
2
  • किशोरों में मेटाकॉग्निशन और करियर निर्णय लेने पर अध्ययन

    DOI:DOI:18.A003.aarf.J14I01.009446

शर्मीला डाॅ. वंदना श्रीवास्तव

Abstract: मेटा कॉग्निशन को अक्सर सोच के बारे में सोचने के रूप में जाना जाता है। मेटाकॉग्निशन एक नियामक प्रणाली है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वयं के संज्ञानात्मक प्रदर्शन को समझने और नियंत्रित करने में मदद करती है। मेटाकॉग्निशन लोगों को अपने स्वयं के सीखने का प्रभार लेने की अनुमति देता है। कभी-कभी लोग मेटाकॉग्निशन के बारे में बात करते समय श्गोइंग मेटाश् वाक्यांश का उपयोग करते हैं, जो आप क्या कर रहे हैं यह देखने के लिए पीछे हटने की प्रक्रिया का जिक्र करते हैं, जैसे कि आप कोई और इसे देख रहे थे। गोइंग मेटा का अर्थ है अपने स्वयं के प्रदर्शन का दर्शक बनना- इस मामले में, आपका अपना बौद्धिक प्रदर्शन।


9-17
3
  • उच्च माध्यमिक स्तर पर अध्ययनरत छात्रों पर आधुनिक फिल्म संस्कृति का प्रभावरू एक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

    DOI:DOI:18.A003.aarf.J14I01.009908

ऋचा महर्षि एवं प्रो. ;डॉद्ध चंदन सहारण

Abstract: फिल्में समाज का दर्पण होती हैं, जो समाज में व्याप्त बुराइयों और विसंगतियों को उजागर कर उन्हें समाप्त करने के लिए प्रेरित करती हैं। वे लोगों को जागरूक करने का एक सषक्त माध्यम हैं, जो समाज के विभिन्न मु६ों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं। हालांकि, वर्तमान में कुछ भारतीय फिल्मों में पष्चिमी परंपराओं के साथ-साथ अष्लीलता का भी प्रचलन बढ़ता जा रहा है, जिसका भारतीय संस्कृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।


18-29
4
  • ग्रामीण एवं शहरी महिलाओं में शिशु पालन पद्धतियों का सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन

    DOI:DOI:18.A003.aarf.J14I01.010037

SUSHMA SURESH JAJU Dr. Savita Sangwan

Abstract: बच्चों को खिलाने की प्रथाएँ और पालन-पोषण की शैलियाँ बच्चों की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये प्रथाएँ सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय कारकों से काफी प्रभावित होती हैं, जो अक्सर ग्रामीण और शहरी पद्धति के बीच काफी भिन्न होती हैं। इस शोध का उद्देश्य ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा अपनाए जाने वाले शिशु पालन-पोषण और पालन विधियों की वर्तमान स्थिति एवं उनके प्रभाव का विश्लेषण करना है। अध्ययन में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक पृष्ठभूमि के अंतर्गत महिलाओं की भूमिका, जिम्मेदारियां और दृष्टिकोण की तुलना की गई है। प्रस्तुत अध्याय शोध का निष्कर्ष खण्ड के अन्तर्गत अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों की विवेचना की गयी है। इस शोध के अन्तर्गत कुल 200 नवविवाहितों का चयन किया गया है। 100 ग्रामीण क्षेत्र एवं 100 शहरी क्षेत्र से है। प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध मुंबई महानगर के नगरीय तथा ग्रामीण परिक्षेत्र के कुछ बालकों के व्यक्तित्व निर्माण एवं सामाजिक उत्थान पर शिशु पालन पद्धतियों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए अभिकल्पित किया गया था, जिसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शिशु-पालन पद्धतियों का विहंगम अध्ययन करना है। शहरी बच्चों में स्तनपान की प्रथा ग्रामीण बच्चों की तुलना में बेहतर पाई गई।


30-40
5
  • कामकाजी महिलाओं की दोहरी भूमिका और उनकी दैनिक जीवन की समस्याएं

    DOI:DOI:18.A003.aarf.J14I01.010039

Ranjana Ajabrao Nakshine Dr. Savita Sangwan

Abstract: कमकाजी महिलाओं को घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियों का निर्वाह करना पड़ता है। प्रायः देखा जाता है कि पति और उसके परिवार के अन्य सदस्यों का सहयोग सहज रूप में नहीं मिल पाता। पति भी अमानवीय व्यबहार करने से बाज नहीं आते। ऐसी स्थिति में मनोबल टूटना स्वाभाविक है। यहां तक कि दाम्पत्य संबंध में भी कटुता आ जाती है। इस दोहरी भूमिका में कामकाजी महिलाओं कों मानसिक तनाओं से होकर गुजरना पड़ता हैं बाहर का काम, फिर धर का काम, बैलों की तरह जुतना हो जाता है। बदलते वक्त ने महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से सशक्त किया है और उनकी हैसियत एवं सम्मान में वृद्धि हुई है। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह है महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारी। खाना बनाना और बच्चों की देखभाल अभी भी महिलाओं का ही काम माना जाता है। कई महिलाएं घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बिठाने में दिक्कत महसूस करती है और बाद में नौकरी छोड़ देती हैं।


41-46
6
  • महिलाओं की पोषण स्थिति और उनके शारीरिक एवं व्यवहारिक विकास पर इसके प्रभाव

    DOI:DOI:18.A003.aarf.J14I01.010040

Pallavi Rameshrao Deshmukh Dr. Savita Sangwan

Abstract: आजादी के बाद महामारियों पर नियंत्रण और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार तथा स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूकता के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाएं, जो इस देश की आधी आबादी हैं, रक्त और उचित पोषण के अभाव में विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसी कई महिलाएं हैं जो कुपोषण के कारण टीबी से ग्रस्त हैं, ऐसी महिलाओं की भी बड़ी संख्या है जो विभिन्न प्रसूति रोगों की शिकार हैं। खराब स्वास्थ्य के कारण विकलांग जीवन जीने वाली महिलाओं की संख्या भी बहुत बड़ी है। आज के इस भागमभाग जिन्दगी में सभी मनुष्य कम समय में अधिक धनोपार्जन कर जिन्दगी के सभी ऐश- आराम की वस्तुओं का शौकीन होता चला जा रहा है । यह तभी संभव है जब हमारा मन मस्तिष्क हाथ-पैर सभी आपस में मिलकर चले । यह भी तभी संभव होगा हम अपने स्वास्थ्य पर पूरा-पूरा ध्यान देंगे । इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि हमें विशेषकर महिलाओं को स्वास्थ्य शिक्षा की जानकारी होगी क्योंकि महिलाओं पर ही सम्पूर्ण घर के लोगों का स्वास्थ्य-व्यवस्था की जिम्मेवारी होती है।


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